Subscribe

RSS Feed (xml)



Powered By

Skin Design:
Free Blogger Skins

Powered by Blogger

Friday, August 31, 2007

धीरज का पुल ही काम आएगा...दु:ख खो जाएगा

दु:ख तो आता ही है
सुख दूर परदेसी बन जाता है
कभी कभी एलबम में रखे
पुराने चित्र सा नज़र आता है
सुख और दु:ख के बीच
बन जाती है खाई
कैसे करें पार
मन में अशांति अपार
समाधान है मन के ही पास
सुख और दु:ख को मानो दो किनारे
बीच में है गहराई
आत्म-विश्वास जगाओ
वह गहराई है
मन
एक खाई सी प्रतीती है जो
उससे आओ बाहर
धीरज नाम का एक सेतु है
नीचे से ऊपर लाओ
सुख और दु:ख के बीच उसे
बिछाओ....फ़ैलाओ
थोड़ा श्रम तो करना ही पड़ेगा
बहुत गहरे पड़ा था न
धीरज
तो उसे ऊपर आने में वक़्त तो लगेगा ही
देखो देखो ....वह आ गया ऊपर
दुख के इस छोर से चलो
देखो सुख मुस्कराता
तुम्हारा स्वागत करने को तैयार है
बस इतना ही तो करना पड़ा न
तो इस धीरज को हमेशा
बनाओ एक हथियार
दु:ख से पाओ पार

Wednesday, August 22, 2007

अब तो ये आलम है कि ख़ुद से ही मुलाक़ात नहीं होती !

पूछो न मन से ऐसा क्यों हो रहा है
मिल रहे हैं सब से
न जाने कब से
लोकाचार है
संसार है
व्यवहार है
त्योहार है
कहीं ये अत्याचार तो नहीं मन पर
कितना बोझ बढ़ा दिया है मन पर
छटाक भर का ह्र्दय कोमल सा
उस छोटे से मन पर मन भर का बोझ बढ़ाते हो तुम
थक नहीं जाते हो तुम ?

मैने तो सुना था दूसरे सताते हैं तुम्हें ?
तुम तो खु़द के सताए लगते हो !

क्यों भाग रहे हो इतना
गुणा-भाग ही करते रहोगे
या ये भी जानोगे कि जोड़ने में घट गए कितना

मिलो यारब...ख़ुद से मिलो
चलो आज से ही शुरू करो

सत्य है तुममें
सत्व है तुममें
जब जागो तब सुबह है
अंर्त-आत्मा को जानो
निज को पहचानो

पढ़ने पढ़ाने में
सुनने सुनाने में
खु़द को नहीं पढ़ पाए मियाँ

ऐसी भी क्या व्यस्तता
सब से मिलते हो
अब तो ये आलम है कि खु़द से ही मुलाक़ात नहीं होती
क्या ये सच बर्दाश्ते क़ाबिल है
चिंतन के आईसीयू में मन को ले जाओ
चिता जले उसके पहले ख़ुद चेत जाओ

Wednesday, August 15, 2007

सब मुसाफ़िर हैं यहाँ कोई नहीं रह जाएगा

ज़िन्दगी की सचाइयाँ बयाँ करते चंद अशाअर


अज़हर हाशमी ’इनायती’:

रास्तो क्या हुए वह लोग जो आते जाते
मेरे आदाब पे कहते थे के जीते रहिये.

मुनव्वर राना:

बिछड़ेंगे तो मर जाएंगे हम दोनो हम दोनो बिछड़कर
इक डोर में हमको यही डर बांधे हुए है.

ठंडे मौसम में भी सड़ जाता है बासी खाना
बच गया है तो ग़रीबों के हवाले कर दे.

कोई दु:ख तो कभी कहना नहीं पड़ता उससे
वह ज़रूरत को तलबगार से पहचानता है

अहमद फ़राज़:

बदन चुरा के न चल ऐ क़यामते - ग़ज़दाँ
किसी किसी को तो हम आँख उठा के देखते हैं.

’मस्त’कलकत्तवी:

वह फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया
इज़्ज़्त उसे मिली जो वतन से निकल गया


वाली आसी:

लोग प्यास अपनी बुझाते हैं चले जाते हैं
और दरिया है कि चुपचाप रवाँ रहता है

देर तक रहे रहे दाता तेरी ऊँची सराय
सब मुसाफ़िर हैं यहाँ कोई नहीं रह जाएगा.

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी:

अब कह दिया तो साथ निभाएंगे उम्र भर
हालाँकि दोस्ती का ज़माना तो है नहीं

वसीम बरेलवी:

लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो
मुझे घटा के तू गिनती में रह नहीं सकता

नामालूम:

अपनी फ़ज़ा से अपने ज़मानों से कट गया
पत्थर खु़दा हुआ तो चट्टानो से कट गया

बशीर बद्र:

चमक रही है परों में उड़ान की खु़शबू
बुला रही है हमें आसमान की खुशबू

राहत इन्दौरी:

अब ग़म आएं,खु़शियाँ आएं,मौत आए या तू आए
मैने तो बस आहट पाई और दरवाज़ा खोल दिया

मशहूर शायर मुनव्वर राना की किताब
सफ़ैद जंगली कबूतर से साभार.

Monday, August 13, 2007

पन्द्र्ह अगस्त...कुछ सुरीले उत्सव विकल्प

एक प्यारी छुट्टी आ गई बहुत दिनो बाद
राष्ट्र-प्रेम वेम ....छड यार
कुछ सुरीली बात बता
कौन जाए झंण्डा तानने
ये नेताओं का काम है भई

तो ले सुन क्या क्या कर सकते हैं पन्द्रह अगस्त को...

फ़ार्म हाउस चले जाओ...पिकनिक मनाओ

बाज़ार चले जाओ ...सेल चल रही है जगह जगह
ख़रीदारी में छूट ...लूट सके तो लूट

दोस्तों को घर बुला लो
पत्ते खेलो...आउटडोर गेम हो नहीं सकता..
बारिश की वजह से कीचड़ है काँलोनी में

सी.डी.ले आओ...पिक्चर देखो

शादी के एलबम की धूल झाड़ लो

ज़ोर ज़ोर से म्युज़िक सिस्टम चलाओ
नाचो..कूदो...चिल्ल्लाओ.

किसी से पैसे वसूलना हो ..
धावा बोल दो...पंद्रह अगस्त की छुट्टी रहती है
घर ही मिलेगा...धर लो अगले को

लाँग ड्राइव पर निकल जाओ
हाई-वे पर भुट्टे सिकवाओ
नमक मिर्च लगा कर खाओ

पुरानी पत्रिकाएँ निकालो
किसे याद है किसकी कविता है
अपने नाम से ब्लाँग लिख डालो

पंद्र्ह अगस्त तो आते ही रहती है
किसको पड़ी है यार देशप्रेम की
निहायत ही हिप्पोक्रेटिक काम है
पैमाने टकाराओ
कहो...
चीयर्स....
लाँग लिव इंडिया...
सब करो
सब कहो
बस...सच मत कहो !

Sunday, August 12, 2007

मदर इण्डिया की डायमण्ड जुबली...एक रस्म अदायगी

घर का बुज़ुर्ग साठ का होने वाला हो तो अगली पीढ़ी कितनी प्रसन्न नज़र आती है. आजकल तो षष्टिपूर्ति समारोहों की तैयारियों के निमंत्रण पत्र छपते हैं, पार्टियाँ दी जातीं हैं ...संगीत के आयोजन होते हैं..खानेपीने की महफ़िलें सजती हैं.. तीन दिन बाद भारत नाम का बाबा पूरे साठ साल का होने वाला है लेकिन देश में किसी तरह के कोई जश्न या उल्लास का नामोनिशन नहीं है.हमारे राजनेता कम से कम देश की आज़ादी का पर्व को तो मिल कर मनाते ..यहाँ कहाँ आड़े आ गईं राजनैतिक प्रतिबध्दताएँ ? पार्टी पाँलिटक्स ? विचारधाराएँ ? पूरे देश के स्तर पर कोई माहौल नज़र नहीं आ रहा. लगता है एक और पन्द्रह अगस्त की तरह बीत जाएगी यह विशिष्ट तिथि.हीरक जयंती जैसा कोई जोश ही नहीं देश में. फ़िर एक बार स्कूली बच्चों को पेल कर और सैनिकों को ठेल कर प्रभारी मंत्री ज़िला मुख्यालय पर सलामी ले लेंगे और फ़िर वैसे ही दूरदर्शन प्रसारित कर देगा लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन..और लीजिये साहब मन गई भारत की हीरक जयंती. सामान्य आदमी के स्तर पर कोई जोश या उत्साह दिखाई नहीं देता . न्यू ईयर,वैलेंटाईन डे और फ़्रेण्डशिप डे को उन्माद की हद तक ले जाने वाले पीढ़ी को कहाँ फ़ुरसत की मदर इण्डिया की डायमण्ड जुबली सेलिब्रेट करे...कोई आव्हान ..देश में कोई रचनात्मकता या कोई ख़ुशी बन नहीं पा रही है .पाश्चात्य सभ्यता को कोसने वाले लोगों ! कभी टाइम मिले तो देखियेगा अमेरिका अपना राष्ट्रीय पर्व कैसे मनाता है ; आमजन ऐसे जुटते हैं मानों उनके परिवार का प्रसंग हो . दोगली मानसिकता वाले देश के स्वार्थी लोग एक बार फ़िर से भारत को ग़ुलाम बना कर छोडे़गे.लगता है रानी लक्ष्मीबाई,तात्या टोपे,सुभाष बाबू, भगतसिंह,आज़ाद,सरदार पटेल, अज़ीमुल्ला खाँ,अमरसिंह, कुवँरसिंह और अशफ़ाकउल्ला की क़ुरबानियों को मध्दिम करने की साज़िश रची जा रही है..

ज़रा हम अपने दिल पर हाथ रख कर पूछें कि पद्रह अगस्त के झंण्डा वंदन कार्यक्रम और किसी शाँपिंग माँल की सेल दोनो में से कहाँ जाना चाहेंगे ....तो निश्चित रूप जवाब शाँपिंग माँल के पक्ष में ही आएगा...भारत माता लानत है तेरे देशवासियों पर.

एक अनमोल दस्तावेज़...15 अगस्त 1947 का टाइम्स आँफ़ इण्डिया


एक मित्र ने ई-मेल के ज़रिये आज बडे़ प्रेम से ये बहुमूल्य उपहार भेजा है सो


आप सब के लिये जारी कर रहा हूँ...आप भी इसे विस्तार दीजिये.


महात्मा गाँधी की तमाम कोशिशों के बावजूद बँटवारा हुआ देश का...स्वाधीनता दिवस


की हीरक जयंति की बेला में इस दिन को इतिहास के एक सच की तरह भी याद किया जाना चाहिये.

Saturday, August 11, 2007

किसी दिन बिक जाएगी विविध भारती भी.

इन दिनों एफ़.एम.स्टेशनों की बहार है देश के कई शहरों में.मेरे पास हैं तीन तीन ट्रांज़िस्टर सैट ..सब एक से एक बेहतर ब्रांड. माय एफ़ एम....बिग एफ़.एम....रेडियो मिर्ची तीनों की फ़्रीक्वेंसी आसपास है.इसी के पास है संगीत के सुनहरे दौर का साथी विविध-भारती..जब इतने सारे विकल्प हो गए संगीत के तो लगता था कि ज़िन्दगी ख़ुशनुमा हो जाएगी,लेकिन बुरे हाल हैं इन दिनो.सभी की फ़्रीक्वेंसी दूरदर्शन के एक ही टाँवर से वितरित हो रही है ..रेडियो सैट आँन करो तो लगता है सारा संगीत भेलपूरी बन गया है. हम ग़रीब विविध भारती के दौर वाले..पर कभी उसमें घुस रहा है माय एफ़.एम तो कभी रेडियो मिर्ची तो कभी बिग एफ़.एम.यूँ लगता है जैसे एक अपार्टमेंट के तीन फ़्लैट्स के रसोईघरों का धुँआ नाक में घुस आया है. ये संगीतप्रेमियों के कानों का संक्रमण काल है ये. तीनों एफ़.एम.फ़्रीक्वेंसीज़ का भी बुरी तरह घालमेल हो रहा है...तीनो पर एक जैसा धिकचिक धिकचिक शोर...ग़नीमत से या आपकी क़िस्मत से कभी विविध भारती ठीक से सुनाई देने लग जाए तो लगता है बहुत दिनों बाद अस्पताल से घर लौटे हों....प्रसार भारती नाम का ठेकेदार लाया है इन एफ़.एम. चैनल्स को मैदान में और खु़द अपनी विविध भारती की हत्या कर बैठा है...किसी दिन याद कीजियेगा एक पंक्ति का ये सच ...विविध भारती भी किसी मुकेश अंबानी को बेच दी गई..

कहीं सुना आपने कि किसी व्यापारी ने अपनी चलती दुकान में ही दो पडौसी दुकानदारों को बिठा लिया और कहा आओ दोस्त तुम भी मेरी छत के तले ही अपना वही माल भी बेचो जो मै बेच रहा हूँ..प्रसार भारती ऐसा ही बेवकूफ़ बनिया साबित हो रहा है.

अब रफ़ी तो सुनो तो ध्यान देना

रफ़ी साहब के गीतों में सबसे लाजवाब और बेइंतहा स्पष्ट सुनाई देने वाला शब्द है 'स'
अब जब भी सुनें ध्यान दीजियेगा..सच शब्द की शुरूआत भी तो स से ही होती है और संगीत भी स से और सात सुरों मे पहला 'सा' यानी षड्ज भी स ही तो है ...तो क्या रफ़ी के कंठ में षड्ज शाश्वत सुर है.

कोई काम नहीं करना चाहता !

दफ़्तरों में ऊँचे सैलेरी पैकेज की बात तो हर कोई करता है लेकिन काम कोई नहीं करना चाहता.एक हक़ीक़त ये भी है कि जो काम करता है उसकी पूछ संस्थाएँ नहीं करती.मध्यमवर्गीय आकार के जो कारोबार हैं उनकी बारह बजा रखी है काँर्पोरेट कल्चर वाली कम्पनियों ने. वो ज़माना गया जब एक मुनीमजी पूरी ज़िन्दगी एक पेढ़ी पर निकाल देते थे.अब टोटल टाइम पास की बात हो रही है. जब भी सेल्फ़ एँटप्रोन्योर (स्व-उद्यमी) के रूप में कामकाज शुरू करना चाहें तो दस बार सोचें..क्योंकि आप किसी नये बंदे को तैयार करें और ये उम्मीद रखें कि ये जीवनभर आपका साथ निभाएगा तो आप ग़लत सोच रहे हैं...काम का उतना ही फ़ैलाव करें जितना आप सम्हाल सकें.जहाँ तक दफ़्तरों में काम करने की बात है ..समर्पण का समय गया साहब. आपबीती की बानगी देखिये....
शर्माजी उस स्टेटमेंट का क्या हुआ ?

आपका प्रश्न एक है...उत्तर अनेक हो सकते हैं.

- सर...लाइट गई हुई थी..कंप्यूटर आँन नहीं कर पाया.

- सर...यू.पी.एस. की बैटरी डाउन है.

- सर...पेपर नहीं था.

- सर...भूल गया.

- सर...टाइम ही नहीं मिल पाया

-सर...साँफ़्टवेयर ही काम नहीं कर रहा.

-सर...निकाला था लेकिन एंट्री पूरी नहीं थी.

ज़रा सच सच बताइये ऐसे उत्तरों को सुनकर आप क्या करेंगे..सर अपना सर पीट लीजिये

Friday, August 10, 2007

एफ़ एम रेडियो स्टेशनों के लेट नाइट शोज़

कहीं डाँक्टर लव के नाम से तो कहीं तंदूरी नाइट्स के नाम से रात दस बजे के बाद एफ़.एम.स्टेशन्स लेट नाइट शोज़ कर रहे हैं.अब डाँक्टर लव को लें ..इसमें आर.जे. बताती है कि प्यार कैसे किया जाए.तंदूरी नाइट्स आग्रह करता है कि आप अपने दिल के राज़ आर.जे.के साथ खोलें.इसमें ज़्यादातर काँलर्स युवा हैं और बात अंतरंग रिश्तों और प्यार-मुहब्बत की ही करते रहते हैं.बाप अपने पी.सी.पर बैठा ब्लाँग लिख रहा है..माँ अहा!ज़िन्दगी पढ़ रही है.बेटा-बेटी डाँक्टर लव और तंदूरी नाइट्स सुन रहे हैं.बताइये तो कोई क्या करे ? पी.सी. और पत्रिका बन्द कर सुन ले लग जाए ये शोज़..या दूसरे कमरे में चले जाए. दकियानूस नहीं हूं लेकिन ज़िन्दगी की कुछ सचाइयाँ तो वक़्त पर ही मालूम पड़ना चाहिये न.
आप क्या सोचते हैं..सच बताइयेगा.ऊपर लिखा भी सच्ची आपबीती है जनाब.

श्याम बेनेगल को सम्मान...पुरस्कार नहीं

टाइम्स आँफ़ इण्डिया जैसा बहुप्रसारित और प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अख़बार लिखता है कि श्याम बेनेगल ने दादा साहब फ़ालके पुरस्कार जीता....मुझे लगता है ..श्यामजी ने इसके लिये न तो आवेदन किया था न ही फ़ालके नाम की कोई प्रतिस्पर्धा होती है इस देश मे....न ही श्याम बेनेगल जैसी बलन का फ़िल्मकार किसी तरह की रेस में रहा है..लेकिन हमारा मीडिया है अपनी तमीज़ गढ़ता है...श्याम बेनेगल दादा साहब फ़ालके सम्मान से नवाज़े गए है...और यह भी तो सच है कि बेनेगल के नवाज़े जाने से सम्मान भी तो सम्मानित हुआ है.सच बोलना चाहिये न ?

Thursday, August 9, 2007

तसलीमा आपा की कुटाई

जिन्होने ये पराक्रम किया उनकी निजी ज़िन्दगी में झाँकिये...
ये वैसे ही निकलेंगे जिन्हें तसलीमा आपा उघाड़तीं आईं हैं.
शब्द को शब्द से पराजित कीजिये न श्रीमान !

मै कितना पढा़ गया

ब्लाँग लिखने के बाद पहली चिंता...ब्लाँगवाणी / चिट्ठाजगत / नारद देखो...कितनी बार पढ़ा गया मैं ?
कितनी छटपटाहट है दिख जाने की...इसे बिक जाने की कहें तो कैसा रहे.
अरे अपने ब्लाँगर भाई/बहनों की टिप्पणियों के हाथों प्यार से बिक जाने की बात कर रहा हूँ.
इतनी जल्दी बुरा क्यों मान जाते हो यार. अच्छा ये सच तो बता दो कि टिप्पणी के लिये बेताब रहते हो या नहीं ? ब्लाँग तो मन से मुहब्बत है भाई ( बहन भी) टिप्पणीकारों से नहीं.

नक़ली हँसी.

बचो रे इन नक़ली हँसी वालों से...
इश्तिहारों में
कारोबारों में
परिवारों में
कोई हँसी दिल खु़श करने के लिये नहीं
व्यापार है भाई.

एक पंक्ति का पहला सच !

मुशरर्फ़ मान जाओ...पद का मोह छोड़ो...बहुत तबाह किया जम्भूरियत को...तुम्हारा तबाह होना अनक़रीब है...