Subscribe

RSS Feed (xml)



Powered By

Skin Design:
Free Blogger Skins

Powered by Blogger

Sunday, September 30, 2007

उधारी है शबाब पर

क्रेडिट कार्डों के कल्चर में

उधारी है शबाब पर

वादे निभाने में उधारी

इक़रारनामें में उधारी

बिटिया की गुडिया उधार

माँ की दवाई उधार

भाई की किताब उधार

यहाँ उधार के मानी ये नहीं

कि सारा साज़ो-सामान उधार ख़रीद

कर ला दिया है माँ,बेटी और भाई के लिये

यहाँ उधार के मानी हैं किसी काम को टालने

की एक बेशरम जद्दोजहद

उधार शब्द ज़िंदगी के बेतरतीब,लापरवाह
और गै़रज़िम्मेदार होने की पुष्टि है

नक़द के रूप में उपलब्ध है

वाचालता
दुर्व्यवहार
बे ईमानी
झूठ
लम्पटता
असभ्यता
झाँसे
ताने
ईर्ष्या
असहजता
असहिष्णुता
नाइंसाफ़ियाँ

बाज़ार के इस उधार -नक़द कुचक्र में
रिश्ते हैं छलनी
बिला वजह का बड़बोलापन,दंभ है विस्तृत
क्या करें...
ख़त्म ही करें इस शब्द जाल को
क्योंकि मै नया क्या बता रहा हूँ
मुझसे ज़्यादा तो आप जानते हैं
या तो ऐसे कुचक्रों को आप हम ही तो रचते हैं
या ऐसे कुचक्रों में फ़ँसते हैं

शो मस्ट गो ऑन

Friday, September 14, 2007

श्री गणेश का नया भक्ति-पद


श्री गजानन विघन हर हमरो

उमा तनय वरदाता दयालु



एक दंत लंबोदर गजमुख

रिध्दि-सिध्दि नायक हे गणेश



भक्तन के रक्षक प्रतिपालक

अवढरदानी शिवशंकर सुत कृपालु



Thursday, September 13, 2007

फ़िर आ गई हिन्दी की बरसी

हिन्दी के दुश्मन दर-असल उसके अपने ही हैं.नौकरशाहों के रूप में मौजूद ये लोग अंग्रेज़ी को देवी और हिन्दी को दासी मानते हैं. जब तक हिन्दी को आम बोल व्यवहार के लिये इन नौकरशाहों के कुचक्र से मुक्त नहीं किया जात ; हिन्दी पनप ही नहीं सकती. राजभाषा के कारिंदे हिन्दी सप्ताह में अपनी चाँदी कर लेते हैं....लोग समझते हैं हिन्दी मुस्करा रही है ...हक़ीकत में वह आँसू बहाती है . साहित्यकारों के नाम से जो ढोंग हिन्दी के लिये होता है वह महज़ दिखावा नहीं तो और क्या है. हिन्दी को भुना रही है ये सरकारी समितियाँ. इन लोगों से बेहतर काम तो हिन्दी ब्लाँग लिखने वाले कर रहे हैं.धंधेबाज़ तो नहीं ये लोग...मन-प्राण से हिन्दी में सोचते हैं...लिखते हैं . चाहे फ़िल्मी गीतों पर ही लिखते हैं...चुटकुले ही जारी करते हैं ..पर जो भी करते हैं हिन्दी में करते हैं..और ये नहीं..काफ़ी कुछ गंभीर भी रचा जा रहा है ब्लाँग्स पर.दु:ख इस बात से होता है कि सरकारी स्तर पर हिन्दी को सँवारने....उसे प्रसारित करने की कोई ईमानदार कोशिशें नज़र नहीं आती..रही सही कसर निकालने के लिये इन एफ़.एम.स्टेशन्स की भीड़ आ गई है..क्या बोल रहे हैं ...कैसे बोल रहे हैं...ख़ुद नहीं जानते बेचारे...माँ हिन्दी का फ़टा आँचल मुश्किल अपने नंगे तन को ढाँक पा रहा है दोस्तो....आइये हिन्दी की एक और बरसी पर कुछ सच्ची मातमपुर्सी कर लें .


(ये विचार प्रेमचंदजी को समर्पित और उन्हीं की विचारधारा से प्रेरित)