Saturday, March 8, 2008

अच्छाई और नेकी की खुशबू

अच्छाई और नेकी आपकी दिल की अलमारी
में अलग अलग खुशबू वाले परफ़्यूम की
शीशियाँ हैं........
इन्हें लगाते रहने से
आप भी महकते हैं
ज़माना भी.....
कभी आज़मा कर देखियेगा
निराश नहीं होंगे

Friday, March 7, 2008

मानव को कुछ ज़्यादा महत्व नहीं देती प्रकृति माँ !

प्रकृति में ऐसा कुछ भी नहीं जो यह सिध्द करता हो कि वह किसी अन्य प्रजाति के मुक़ाबले मानव को ज़्यादा महत्व देती हो. एक दिन हम भी ऐसे ही विलुप्त हो सकते हैं और उतनी ही आसानी से और जड़ से, जैसे हमारे सामने कई हज़ारों प्रजातियाँ.......! ध्यान रहे..... प्रकृति माँ का कोई लाड़ला नहीं है !

प्राकृतिक संतुलन जब भी ख़तरे में होता है तो प्रकृति उस संतुलन को बरक़रार रखने के लिये कोई न कोई रास्ता ढूँढ ही लेती है....चाहे इस की क़ीमत कुछ भी हो.

यदि हमारे कारण प्रकृति संकट में आती है तो वह स्वयं को पुन: सज-सँवार लेगी और वह माइकल एंजिलो, शेक्सपीयर, मोज़ार्ट और नरगिस के एक छोटे से पुण्य में कोई भेद नहीं करेगी.

हम यहाँ पर एक ऐसी अदृश्य और प्रबल शक्ति की बात कर रहे हैं जो स्वयं जीवन है और हम उसके
बारे में आदि से लेकर अंत कुछ भी नहीं जानते हैं.हम सिर्फ़ इतना जानते हैं कि विभिन्न प्रजातियों में
प्रकृति का कोई भी अति - प्रिय नहीं है.

Thursday, March 6, 2008

पूरा नॉवेल जो न कह पाए ...एक शे'र कह जाए !

यक़ीनन मशहूर शायर डॉ.बशीर बद्र साहब ठीक फ़रमाते हैं।ऊपर लिखी इबारत उन्हीं का वक्तव्य है.अभी कुछ दिन पहले शायरी से बेइंतहा मुहब्बत करने वाले एक दोस्त ने ये तीन शे'र सुनाएऔर फ़िर याद आ गए...डॉ.बद्र और उनकी बात..........

दोस्त को पहले शे'र के शायर का नाम मालूम था ...बाक़ी दो का नहीं....कितने मुख़्तसर में बात को कहा है और मानी कितने गहरे हैं.......

बेच डाला कल हमने अपना ज़मीर
ज़िन्दगी का आख़िरी ज़ेवर भी गया

(राजेश रेड्डी)

आदतन तुमने कर दिये वादे
आदतन हमने एतबार किया

(नामालूम)

तलवे ज़ख़्मी होने दे
फूलों मत पाँव रख

(नामालूम)

Sunday, March 2, 2008

लक्ष्य पर दृष्टि डालकर चलिए !

लक्ष्य पर दृष्टि डालकर चलिये
शक को मन से निकालकर चलिये

तन है संदूक, साँसें सिक्के हैं
शुभ-अशुभ देखभाल कर चलिये

भूख और आंसुओं की बस्ती में
वक़्त थोड़ा निकालकर चलिये

धन सहित पद-प्रतिष्ठा भी हो जब
अपना आपा संभालकर चलिये

सत्य के जल में अपने जीवन को
है ज़रूरी खंगालकर चलिये

इसमें जोखिम तो है मगर युग को
अपने साँचे में ढालकर चलिये

रचयिता:प्रो.अज़हर हाशमी,रतलाम.

Saturday, March 1, 2008

और वह फूलों से लद गया

मैंने ईश्वर से कहा ........
मुझे अपने बारे में बता ?
और वह ......
फूलों से लद गया