Friday, October 26, 2007

जाओ चाँद अपने घर जाओ..हमें फ़ुरसत नहीं तुम्हें निहारने की !

मियाँ अब निकल भी लो
तुम तो फ़ैल गये हो आकाश में
पर हमारे दिल तो संकुचित हैं वैसे के वैसे ही
तुम्हारी शीतल छाया का कोई प्रभाव हम पर नहीं पड़ता

हमें काम है
हमारे सैंसेक्स से
धंधे से
गोरखधंधे से कहूँ तो शायद मेरे दोस्तो को एतराज़ न होगा
हम लिप्त हैं
सास भी कभी बहु थी की घटिया चकल्ल्स में
तुम तो दीप्त हो
अपने उजास से

यार ! कहाँ से जुगाड़ते हो ऐसी प्रेमल ठंडक
हम सब तो धधकते रहते हैं
तमस में सुलगते रहते हैं
जैसे बाप हमारे विरासत कर गए हों
गु़स्सा....झुंझलाहट......चिड़चिड़ाहट

हम कितने वाचाल हैं तुम्हारे सामने
तुम्हारी ख़ामोशी भी एक संगीत है
भोले-भाले चाँद

हमने अपने इर्द-गिर्द ऐसे तामझाम जुटाए हैं
जो हमें ही लीलते जा रहे हैं
रिश्ते हों या जीवन व्यवहार
हम समय से पहले ही बीतते जा रहे हैं


तुम हो नि:श्छल,नि:शब्द
निर्विकार,मासूम,और नेक
हमने तो समेट लिये हैं
अपने आसपास संदेह,
कलेस अनेक

ओ ! चाँद तुम चले जाओ अपने घर
हमें फ़ुरसत नहीं तुम्हे निहारने की
तुमसे बतियाने की
तुम्हारी शीतलता अपनाने की

पूर्णाकार चाँद
तुम पूरे हो आज
फ़िर घटोगे
फ़िर बढो़गे

हम तो घटिया हैं
कभी बढे ही नहीं
पूर्ण क्या ख़ाक होंगे.


जाओ चाँद अपने घर जाओ
मै नहीं निहारूंगा तुम्हे
तुम्हे देखने से मुझमें ये हीन भाव
आकार लेता है कि
हम तो वाचालता,ईर्ष्या,तमस,
कुचक्र और कुचालों के कितने
दाग़ लेकर
अपनी ज़िंदगी ढो रहे हैं
तुममें बस थोड़ा सा दाग़ है
इस पर भी शायर तुम्हे कोसते हैं
हम अपने को कितना कोसें

जाओ ! चाँद तुम अपने घर जाओ !

1 comments:

राजीव said...

सुन्दर है, अपने ही मनोभावों का चित्रण परंतु चाँद से इर्ष्या की बात ठीक नहीँ। हम कुछ सीख भी तो सकते हैं अपनी अनियंत्रित ऊष्मा को शीतलता में बदलने का सबक। मज़ा यह कि चाँद त यह पाठ हर 28 दिन बाद सिखाने ही आ जाता है!